
दिनांक 8.2.26
309 सदस्यता क्रमांक
विषय
अब और क्या बाकी
बताना रह गया।
दुनियादारी को समझते हुए
सुख-दुख के गुब्बारे उड़ाए।
धरती से नभ तक खूबसूरत
जी भर के मुक्त नज़ारे देखें।
अब क्या रह गया देखने का?
जमीन पर खड़े, पर कांप रहे हैं
आत्माएं मार्ग पर फिसल रही है।
दूषित जल का भय मौत की घंटी
वायु प्रदूषण का प्रकोप सम्मुख है।
अब क्या बाकी है कुछ कहने का?
नशे में रंगीला जमाना देखते
नाश से सर्वनाश की ओर बढ़ते ।
कौन थामेगा हाथ जवानों का
चीखते रोते बाल बच्चों को देखते
अब क्या बाकी बयां करने का ?
मानवता की सीढ़ी उतरते हुए
गुमराह हुए औरो को भी करते।
अमानवीय व्यवहार को दर्शाना
सहज हो गया है समाजिकता में।
अब क्या बाकी बताना रह गया?
सद्गुण अवगुणों के स्थान पर
हम ही करते अशांति का आह्वान।
नयन मुख का नीर अब सुख गया
वक्त दर्द से आहें भर हो गया चुप।
अब और क्या बाकी बताना रह गया।
अमिता मराठे
इंदौर मध्यप्रदेश

behtreen