
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित
आई डी क्रमांक 2359
अंजू कमलेश, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
स्वरचित
शीर्षक-
अब और क्या बाकि बताना रह गया
अब और क्या बाकि रह गया बताना,
सोशल मीडिया पे जी रहे, असली जिंदगी में खोए हुए पाना,
लिख रहे हैं बड़े-बड़े सपने, पर हकीकत में फंसे हुए माना।
अब और क्या बाकि रह गया बताना,
पैसा, शोहरत, सब चाहते हैं, पर मेहनत कोई नहीं करना थाना,
कामयाबी की चाहत में, अपने आप को भूल गए हैं जाना।
अब और क्या बाकि रह गया बताना,
फिल्मी गानों पे नाचते, इंस्टा रील्स में खोए हुए खाना,
अपने भविष्य की नहीं सोचते, बस आज की पार्टी में सोए हुए माना।
अब और क्या बाकि रह गया बताना,
प्यार-मोहब्बत के नाम पे, बस दिल तोड़ते हैं जाना,
अपने सपनों को भूलकर, दूसरों की राह पर चलते हैं ठाना।
अब और क्या बाकि रह गया बताना,
कुछ पीढ़ियों की यही हालत, बस समय बर्बाद कर रहे माना,
अपने भविष्य को न बनाएं, बस वक्त को मार रहे हैराना।
घुमें समय का पहिया निरंतर,क्या अब भी बताना रह गया?
न जाने,
किस कर्म की है यह परीक्षा, अब और क्या बाकी बताना रह गया!
