
शीर्षक: जिंदा मुर्दा
लेखिका: मनीषा कुमारी
हर चलती-फिरती जिंदगी, सच में जिंदगी नहीं होती।
कुछ लोग जीते-जी भी मुर्दों के समान होते हैं।
वे जिंदा तो होते हैं, उनका शरीर काम करता है,
मगर उनकी भावनाएँ और संवेदनाएँ मर चुकी होती हैं।
वे खुद के ही अंदर कहीं गहरे दफन हो चुकी होती हैं,
क्योंकि इंसान ने उन्हें कभी समझा ही नहीं—
कि उन्हें वास्तव में चाहिए क्या।
इंसान दुनिया के लिए जीते-जीते
अपने ही भीतर, अपने लिए मरता जा रहा है।
वह जिंदा है, मगर एक जिंदा लाश बन चुका है,
जिसकी आत्मा बहुत पहले ही शिथिल हो चुकी है।
बस एक चलता-फिरता शरीर रह गया है,
जिसमें न एहसास है, न ही कोई सच्ची भावना।
जिस तरह हम रोबोट को नियंत्रित करते हैं,
उसी तरह इंसान भी आज मशीन सा हो गया है।
वह इंसान तो है,
मगर इंसानियत और भावनाएँ उससे दूर हो चुकी हैं।
