
विषय: हौसलों की उड़ान
नाम: मोनालिसा पोद्दार
स्थान: भागलपुर, बिहार
दिनांक: 15 फरवरी 2026
हौसले की उड़ान
सुबह सामान्य थी,
सूरज भी रोज़ की तरह ही
उगा था —
पर मुझे क्या पता था
कि यह दिन
मेरी परीक्षा बनकर आएगा।
मैं निकली थी सपनों की राह पर,
हथेली में उम्मीद की गरमाहट लिए,
पर दोपहर तक
रास्ते ने अपना रंग बदल लिया।
चारों ओर प्रश्न थे,
जवाब कहीं नहीं।
दरवाज़े बंद,
खिड़कियाँ मौन।
मैं सचमुच फँस गई थी —
लोगों की शंकाओं में,
अपनों की चुप्पियों में,
और अपने ही डर के जाल में।
साँसें तेज़ थीं,
आँखें नम।
मन बार-बार पूछता —
“अब क्या होगा?”
समय ठहर-सा गया था।
घड़ी की सुइयाँ भी
जैसे मेरा साहस परख रही थीं।
मैंने पहली बार
अपने भीतर की आवाज़ को सुना —
वह धीमी थी,
पर स्पष्ट।
उसने कहा —
“दीवारें बाहर नहीं,
अंदर खड़ी हैं।”
मैंने आँसू पोंछे।
डर को नाम दिया —
और फिर उसे विदा कर दिया।
शाम होते-होते
मैंने वही दरवाज़ा
दुबारा खटखटाया
जो दोपहर में बंद मिला था।
इस बार आवाज़ काँपी नहीं।
नज़रें झुकी नहीं।
और तभी —
दरवाज़ा खुला नहीं…
मैंने उसे खोल दिया।
वह दिन
जब मैं फँसी हुई थी,
दरअसल
वही दिन था
जब मेरे पंख उग रहे थे।
क्योंकि हौसले की उड़ान
आकाश मिलने से नहीं,
हार मान लेने के विचार टूटने
से शुरू होती है
“मुझसे नहीं हो पाएगा”
इस विचार के अंत
होने से शुरू होती है।
और उस रात
मैंने पहली बार जाना —
उड़ान बाहर नहीं,
भीतर जन्म लेती है।
(यह रचना उस दिन की सत्य अनुभूति है, जब परीक्षा-फॉर्म भरने का अंतिम अवसर था और पोर्टल बार-बार असफल हो रहा था,
किन्तु धैर्य और अंतिम प्रयास ने उसी संध्या सब द्वार खोल दिए।)
मोनालिसा पोद्दार
